देहरादून में आपदा से बड़े पैमाने पर नुकसान, अनियोजित विकास ने बढ़ाया दर्द, अब सबक लेने का वक्त

देहरादून में आपदा से बड़े पैमाने पर नुकसान, अनियोजित विकास ने बढ़ाया दर्द, अब सबक लेने का वक्त

अनिल चन्दोला, देहरादून

राजधानी देहरादून सोमवार को बादल फटने और अतिवृष्टि की विभीषिका से दहल उठी। देर रात हुई मूसलाधार बारिश ने टौंस, तमसा, रिस्पना और बिंदाल जैसी नदियों को उफान पर ला दिया। सहस्त्रधारा और रायपुर इलाकों में बाढ़ का पानी घरों, दुकानों और मंदिरों तक घुस गया। टपकेश्वर महादेव मंदिर का प्रांगण पानी में डूब गया, सहस्त्रधारा में लोग फँस गए और शहर की कई मुख्य सड़कें बहाव में बह गईं। देहरादून-हरिद्वार राष्ट्रीय राजमार्ग पर पुल क्षतिग्रस्त होने से संपर्क भी बाधित हो गया। यह महज एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि वर्षों से चले आ रहे अनियोजित विकास का नतीजा है।

अनियोजित विकास ने बिगाड़ी शहर की हालत

देहरादून कभी अपनी नदियों, झरनों और हरे-भरे जंगलों के लिए पहचाना जाता था। लेकिन पिछले दो दशकों में शहर का तेजी से और बेतरतीब फैलाव हुआ। नदियों के किनारे होटल और रिहायशी कॉलोनियाँ खड़ी कर दी गईं। ड्रेनेज व्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया गया। परिणाम यह हुआ कि अतिवृष्टि और बादल फटने जैसी घटनाओं से बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है।

प्रसिद्ध धार्मिक स्थल भी असुरक्षित

भारी बारिश ने टपकेश्वर महादेव मंदिर परिसर को डुबो दिया। पानी प्रतिमा तक पहुँच गया। हालांकि गर्भगृह सुरक्षित रहा। उसके आसपास के इलाकों में भी नदी का जलस्तर बढ़ने से बहुत ज्यादा नुकसान हुआ है। यह तस्वीर साफ बताती है कि प्राकृतिक धरोहरों और धार्मिक स्थलों के आसपास अनियोजित निर्माण ने जोखिम कितना बढ़ा दिया है।

सीएम समेत सरकारी मशीनरी फील्ड में उतरी

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्थिति का निरीक्षण किया और प्रभावितों को तुरंत राहत पहुँचाने के निर्देश दिए। एसडीआरएफ की टीमें भी तुरंत बचाव कार्य में जुट गई। सहस्त्रधारा और ऋषिकेश में चंद्रभागा नदी क्षेत्र से फँसे लोगों को सुरक्षित निकाला गया। डीएम और एसएसपी समेत पूरी सरकारी मशीनरी बचाव और राहत कार्य में जुट गई। प्रशासन ने तड़के ही रेड अलर्ट जारी कर सभी स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों को बंद कर दिया था।

कई जगह सड़क और पुलों को नुकसान

देहरादून-हरिद्वार राष्ट्रीय राजमार्ग का पुल फन वैली के पास क्षतिग्रस्त हो गया। चकराता रोड पर नंदा की चौकी के पास और सेलाकुई के पास भी पुलों को नुकसान पहुंचा, जिससे आवाजाही ठप हो गई। मालदेवता और रायपुर की कई सड़कें बह गईं। इससे आसपास के गाँवों का संपर्क टूट गया और शहर के भीतर यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ।

स्थानीय लोगों की मुश्किलें बढ़ीं

बारिश और बाढ़ से सबसे ज्यादा असर आम लोगों पर पड़ा। कई घरों का सामान बह गया, दुकानों और होटलों को भारी नुकसान पहुँचा। बिजली और पानी की सप्लाई ठप हो गई। लोग रातभर सुरक्षित स्थानों की तलाश में भटकते रहे। फिलहाल राहत शिविरों में प्रभावित परिवारों को रखा जा रहा है। सेलाकुई औद्योगिक क्षेत्र में बिजली आपूर्ति ठप होने से उद्योगों में उत्पादन पूरी तरह बंद रहा।

प्रकृति के संकेतों को समझने और संभलने की जरूरत

विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर देहरादून में शहरी योजना और निर्माण पर सख्त नियम लागू होते, तो इस आपदा का असर इतना विनाशकारी न होता। नदी किनारे अतिक्रमण, पहाड़ी ढलानों पर कटाई और अवैध निर्माण ने खतरे को कई गुना बढ़ा दिया है। यह घटना साफ चेतावनी है कि अगर अब भी शहर के विकास को प्रकृति के साथ संतुलित नहीं किया गया, तो भविष्य में और बड़ी तबाहियाँ सामने आएंगी। देहरादून की यह आपदा हमें याद दिलाती है कि प्रकृति की चेतावनी बार-बार अनसुनी नहीं की जा सकती। अब समय है कि सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर तय करें कि विकास प्रकृति के खिलाफ नहीं, बल्कि उसके साथ कदम मिलाकर किया जाए। अगर आज नहीं चेते, तो कल बहुत देर हो जाएगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back To Top