देहरादून। महीने की पहली तारीख को खाते में सैलरी आते ही राहत मिलती है, लेकिन कई लोगों के लिए यही रकम 15-20 दिन में गायब होने लगती है। किराया, बच्चों की फीस, राशन, बिजली बिल, मोबाइल रिचार्ज, ऑनलाइन खरीदारी और अचानक आने वाले खर्च, सब मिलकर ऐसा दबाव बनाते हैं कि महीने के अंत में बचत की बात दूर, उधार लेने की नौबत आ जाती है।
अक्सर लोग मानते हैं कि बचत केवल ज्यादा कमाने वाले ही कर सकते हैं। असल बात यह है कि बचत की शुरुआत आय बढ़ने से नहीं, बल्कि पैसे को सही तरीके से बांटने से होती है। जिस दिन सैलरी आए, उसी दिन उसका एक छोटा-सा बजट बना लिया जाए तो खर्च भी नियंत्रण में रहता है और भविष्य के लिए पैसा भी निकलता है।
पहले बचत, फिर खर्च का तरीका अपनाइए
ज्यादातर लोग पहले पूरा महीना खर्च करते हैं और जो रकम बचती है, उसे बचत मान लेते हैं। यही सबसे बड़ी गलती है। सही तरीका इसका उलटा है, सैलरी आते ही बचत की रकम अलग कर दीजिए और बाकी पैसे से महीने का खर्च चलाइए।
मान लीजिए आपकी मासिक आय 30 हजार रुपये है। इसमें से शुरुआत में ही 3 हजार रुपये अलग खाते, RD, SIP या किसी सुरक्षित बचत विकल्प में डाल दीजिए। अब आपके पास खर्च के लिए 27 हजार रुपये हैं। शुरुआत में यह मुश्किल लग सकता है, लेकिन कुछ ही महीनों में इसकी आदत बन जाती है।
बचत की रकम छोटी हो तो भी कोई दिक्कत नहीं है। 500 रुपये या 1,000 रुपये महीने से शुरू की गई नियमित बचत भी लंबे समय में बड़ी राहत बन सकती है।
50-30-20 का आसान बजट फॉर्मूला
अपने खर्च को समझने के लिए 50-30-20 का फॉर्मूला उपयोगी हो सकता है। यह कोई कठोर नियम नहीं है, बल्कि पैसे को दिशा देने का आसान तरीका है।
आय का करीब 50 प्रतिशत जरूरी खर्चों के लिए रखें। इसमें घर का किराया या EMI, राशन, बच्चों की फीस, दवाइयां, बिजली-पानी का बिल और आने-जाने का खर्च शामिल हो सकता है।
करीब 30 प्रतिशत हिस्सा अपनी पसंद और सुविधा के खर्चों के लिए रखें। जैसे बाहर खाना, कपड़े, ऑनलाइन शॉपिंग, घूमना या मनोरंजन। यदि बजट बिगड़ रहा हो तो सबसे पहले इसी हिस्से में कटौती कीजिए।
बाकी 20 प्रतिशत बचत और कर्ज चुकाने के लिए रखने का लक्ष्य बनाइए। इसमें इमरजेंसी फंड, बीमा प्रीमियम, निवेश और क्रेडिट कार्ड या पर्सनल लोन की अतिरिक्त किस्त शामिल की जा सकती है।
कम आय वाले परिवारों में 50-30-20 का अनुपात बदल भी सकता है। जरूरी खर्च 60 या 70 प्रतिशत तक हो सकते हैं। लेकिन बचत का हिस्सा पूरी तरह शून्य न हो, यही सबसे महत्वपूर्ण बात है।
इमरजेंसी फंड क्यों जरूरी है
बीमारी, नौकरी में परेशानी, वाहन खराब होना या परिवार में अचानक कोई बड़ा खर्च, ये बातें बताकर नहीं आतीं। ऐसी स्थिति में लोग अक्सर क्रेडिट कार्ड, ऊंचे ब्याज वाले पर्सनल लोन या रिश्तेदारों से उधार का सहारा लेते हैं।
इससे बचने के लिए एक अलग इमरजेंसी फंड बनाइए। शुरुआत में 10 हजार या 20 हजार रुपये का लक्ष्य रख सकते हैं। धीरे-धीरे इतना पैसा जुटाने की कोशिश करें कि कम से कम तीन महीने का जरूरी घरेलू खर्च निकल सके।
यह पैसा शेयर बाजार या ऐसी जगह न रखें जहां जरूरत के समय तुरंत निकालना मुश्किल हो। इसे अलग बैंक खाते या आसानी से निकाले जा सकने वाले सुरक्षित विकल्प में रखना बेहतर रहता है।
छोटे खर्चों की सूची बनाना जरूरी
महीने का बजट अक्सर बड़े खर्च नहीं, बल्कि छोटे-छोटे खर्च बिगाड़ते हैं। रोज की चाय-कॉफी, बार-बार ऑनलाइन खाना मंगाना, बिना जरूरत की सेल में खरीदारी, कई ऐप्स के सब्सक्रिप्शन और कैब के छोटे सफर, इनका कुल जोड़ महीने में हजारों रुपये तक पहुंच सकता है।
एक महीने तक हर खर्च लिखकर देखिए। मोबाइल के नोट्स ऐप, डायरी या किसी खर्च-ट्रैकिंग ऐप में यह काम किया जा सकता है। महीने के अंत में आपको साफ दिखेगा कि पैसा किन चीजों पर बिना सोचे खर्च हुआ। इस सूची का उद्देश्य खुद को दोष देना नहीं, बल्कि अगली सैलरी से बेहतर फैसला लेना है।
उधार और क्रेडिट कार्ड से रहें सावधान
क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल सुविधाजनक है, लेकिन पूरा बिल समय पर न चुकाने पर इसका ब्याज बहुत महंगा पड़ सकता है। केवल न्यूनतम भुगतान करते रहने से कर्ज लंबा खिंच सकता है।
यदि एक से अधिक कर्ज हैं तो सबसे अधिक ब्याज वाले कर्ज को पहले खत्म करने की योजना बनाइए। नया कर्ज लेने से पहले यह भी जरूर देखें कि उसकी EMI आपकी मासिक आय पर कितना दबाव डालेगी। याद रखिए, EMI में खरीदी गई हर चीज जरूरी नहीं होती। कई बार छोटी-सी इच्छा वर्षों की वित्तीय परेशानी बन जाती है।
बजट का मकसद रोकना नहीं, राहत देना है
पैसे का बजट बनाने का मतलब यह नहीं कि जीवन में कोई खुशी या सुविधा ही न रहे। इसका मकसद सिर्फ इतना है कि आप अपनी कमाई का फैसला खुद करें, न कि हर महीने खर्च आपको नियंत्रित करे।
सैलरी चाहे 15 हजार हो या 1 लाख रुपये, नियम एक ही है, पहले बचत अलग करें, जरूरी खर्च तय करें, गैरजरूरी खर्च पहचानें और आपात स्थिति के लिए थोड़ा पैसा जरूर रखें। यही छोटी आदत आगे चलकर बड़े आर्थिक तनाव से बचा सकती है।
(नोटः निवेश या बीमा का फैसला अपनी आय, जोखिम उठाने की क्षमता और जरूरत के आधार पर करें। जरूरत हो तो पंजीकृत वित्तीय सलाहकार से सलाह लेना बेहतर रहता है।)
