पांच साल जेल में रहा आरोपी सभी आरोपों से बरी, बचाव पक्ष की दलीलों से बदला POCSO केस का रुख

पांच साल जेल में रहा आरोपी सभी आरोपों से बरी, बचाव पक्ष की दलीलों से बदला POCSO केस का रुख

देहरादून। करीब पांच साल तक जेल में रहने के बाद दुष्कर्म और POCSO के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे अरुण कुमार चौहान को बड़ी राहत मिली है। देहरादून की विशेष POCSO अदालत ने उन्हें अपहरण, दुष्कर्म और गंभीर लैंगिक हमले से जुड़े सभी आरोपों से बरी कर दिया। इस मुकदमे में बचाव पक्ष के अधिवक्ता अजय बड़ोनी की पैरवी अहम रही। बचाव पक्ष ने अभियोजन की कहानी में मौजूद विरोधाभासों को एक-एक कर अदालत के सामने रखा और पीड़िता के अलग-अलग बयानों से लेकर मेडिकल तथा दस्तावेजी साक्ष्यों तक पर सवाल उठाए।

विशेष न्यायाधीश (POCSO)/अपर जिला जज कुसुम शानी की अदालत ने 22 सितंबर 2026 को फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। अदालत ने अरुण चौहान को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया और किसी दूसरे मामले में वांछित नहीं होने की स्थिति में तत्काल रिहाई के आदेश दिए।

बचाव पक्ष ने यहीं से पलटा मुकदमे का रुख

अरुण चौहान की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता अजय बड़ोनी ने मुकदमे के दौरान अभियोजन के साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर कई स्तरों पर सवाल उठाए। बचाव का एक प्रमुख आधार यह रहा कि पीड़िता के मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए बयान, मेडिकल के समय बताई गई बातों और बाद में अदालत में दिए गए बयान में महत्वपूर्ण अंतर था।

फैसले में दर्ज तथ्यों के मुताबिक पीड़िता ने धारा 164 सीआरपीसी के बयान में कहा था कि वह और अरुण पहले से एक-दूसरे को जानते थे, करीब चार साल से रिलेशनशिप में थे और एक-दूसरे को पसंद करते थे। बयान में घर से निकलकर हरिद्वार जाने, वहां से अरुण को फोन करने और फिर दोनों के ग्वालियर जाने का विवरण भी दर्ज था।

बचाव पक्ष ने इन्हीं तथ्यों को अदालत के सामने प्रमुखता से रखते हुए अभियोजन के उस कथानक पर सवाल उठाया जिसमें पीड़िता को बहला-फुसलाकर अथवा जबरन ले जाने का आरोप था।

मेडिकल के समय दिए बयान को भी बनाया आधार

मुकदमे में एक महत्वपूर्ण तथ्य पीड़िता के मेडिकल परीक्षण से जुड़ा सामने आया। फैसले के अनुसार मेडिकल परीक्षण के दौरान डॉक्टर के समक्ष दिए गए विवरण में पीड़िता ने अपनी मर्जी से आरोपी के साथ ग्वालियर जाने और दोनों के पहले से रिश्ते में होने की बात कही थी।

अदालत ने इस बयान और दूसरे साक्ष्यों को एक साथ देखते हुए पाया कि पीड़िता और आरोपी पहले से परिचित थे। बचाव पक्ष की जिरह में भी पीड़िता द्वारा आरोपी को पहले से जानने और उसके घर जाने की बात स्वीकार किए जाने का उल्लेख फैसले में है।

कोर्ट में बयान बदला तो बचाव पक्ष ने उठाए सवाल

ट्रायल के दौरान पीड़िता ने अदालत में जबरदस्ती किए जाने का आरोप लगाया। यहीं बचाव पक्ष ने उसके पूर्व बयानों को सामने रखते हुए विरोधाभास की ओर अदालत का ध्यान खींचा।

अदालत ने इस कानूनी पहलू पर भी विस्तार से विचार किया कि मजिस्ट्रेट के सामने धारा 164 सीआरपीसी में दर्ज बयान को अपने आप में substantive evidence नहीं माना जा सकता, लेकिन उसका इस्तेमाल अदालत में गवाह की गवाही की पुष्टि करने या उसमें विरोधाभास दिखाने के लिए किया जा सकता है।

अलग-अलग बयानों को परखने के बाद अदालत ने पाया कि अभियोजन की कहानी को निर्विवाद रूप से स्थापित करने के लिए पर्याप्त विश्वसनीयता नहीं बन रही थी।

मेडिकल रिपोर्ट भी बनी बचाव का महत्वपूर्ण आधार

अधिवक्ता अजय बड़ोनी की ओर से मेडिकल साक्ष्यों को भी प्रमुखता से अदालत के सामने रखा गया। डॉक्टर की गवाही के अनुसार पीड़िता के शरीर पर किसी तरह की चोट के निशान नहीं पाए गए थे। UPT जांच निगेटिव थी और पैथोलॉजी रिपोर्ट के मुताबिक स्लाइड्स में शुक्राणु नहीं मिले थे।

अदालत ने मेडिकल रिपोर्ट को अकेले निर्णायक आधार नहीं माना, लेकिन पीड़िता के बयानों में आए अंतर और दूसरे साक्ष्यों के साथ इसे भी समग्र रूप से परखा।

गेस्ट हाउस का रजिस्टर आया तो सामने आया नया विरोधाभास

अभियोजन की कहानी में गेस्ट हाउस से संबंधित साक्ष्य भी था। लेकिन जिरह के दौरान इससे जुड़ा एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया।

गेस्ट हाउस से जुड़े अभियोजन गवाह ने अदालत में स्वीकार किया कि वह जो मूल रजिस्टर लेकर आया था, उसमें 27 अक्टूबर 2020 को अरुण के आने और 29 अक्टूबर 2020 को जाने की कोई एंट्री नहीं थी।

बचाव पक्ष के लिए यह तथ्य महत्वपूर्ण था, क्योंकि दस्तावेजी रिकॉर्ड से अभियोजन के कथानक की पुष्टि को लेकर सवाल खड़ा हो गया। अदालत ने अपने अंतिम विश्लेषण में इस पहलू का भी उल्लेख किया।

पांच लाख रुपये के पुराने विवाद की कहानी भी कोर्ट तक पहुंची

मुकदमे में बचाव पक्ष ने यह तर्क भी दिया कि दोनों परिवारों के बीच पहले से पैसों का विवाद था। अरुण चौहान ने धारा 313 सीआरपीसी के बयान में दावा किया कि नौकरी के नाम पर पांच लाख रुपये दिए गए थे और पैसे वापस मांगने पर विवाद हुआ।

इस दलील का एक हिस्सा अभियोजन पक्ष की गवाही से भी जुड़ा। फैसले के मुताबिक पीड़िता की मां ने जिरह में स्वीकार किया कि मौजूदा मुकदमा दर्ज होने से पहले आरोपी के पिता ने उनके खिलाफ ग्वालियर थाने में प्रार्थना पत्र दिया था। अदालत ने इससे यह माना कि दोनों परिवारों के बीच पैसों के लेन-देन को लेकर पहले से विवाद का पहलू रिकॉर्ड पर मौजूद था। हालांकि अदालत ने इस दावे को अकेले बरी करने का आधार नहीं बनाया, बल्कि बाकी साक्ष्यों के साथ इसका मूल्यांकन किया।

POCSO की धारा 29 पर भी हुई अहम कानूनी बहस

मुकदमे का एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू POCSO Act की धारा 29 के तहत आरोपी के विरुद्ध बनने वाली वैधानिक धारणा थी। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों के निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस धारणा के बावजूद अभियोजन को पहले अपराध के बुनियादी तथ्यों को साक्ष्यों के जरिए स्थापित करना आवश्यक है।

कोर्ट ने अपने विश्लेषण में पाया कि अभियोजन अपना कथानक पूरी तरह साबित नहीं कर पाया। फैसले में गवाहियों के विरोधाभास, मेडिकल साक्ष्य और बचाव पक्ष की कहानी समेत पूरे रिकॉर्ड को ध्यान में रखा गया।

पांच साल बाद आया फैसला, सभी आरोपों से दोषमुक्त

अदालत ने अंत में स्पष्ट निष्कर्ष दिया कि अभियोजन POCSO Act की धारा 5/6 तथा आईपीसी की धारा 363, 366ए और 376 के तहत लगाए गए आरोपों को सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहा। इसलिए अरुण कुमार चौहान संदेह का लाभ पाने के अधिकारी हैं।

इसके बाद अदालत ने उन्हें सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। फैसला सुनाए जाने के समय अरुण देहरादून जिला कारागार में बंद थे। कोर्ट ने जेल अधीक्षक को आदेश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।

इस तरह पांच साल चले मुकदमे में बचाव पक्ष के अधिवक्ता अजय बड़ोनी की जिरह और साक्ष्यों में विरोधाभासों को अदालत के सामने रखने की रणनीति महत्वपूर्ण रही, जबकि अंतिम निर्णय अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद समस्त साक्ष्यों और लागू कानूनी सिद्धांतों का मूल्यांकन करने के बाद दिया।

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